चरन सरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं।
नव निकुंज निजु माधुरी, क्यों परसै मन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (2)
जब तक प्रकट प्रेमस्वरूप श्री हरिवंश के श्रीचरणों की शरण नहीं ली जाती, तब तक नित्य निकुंज की नित्य नवायमान रस-माधुरी को मन स्पर्श भी कैसे कर सकता है; अर्थात् वह उसे स्पर्श ही नहीं कर सकता।
नव निकुंज निजु माधुरी, क्यों परसै मन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (2)
जब तक प्रकट प्रेमस्वरूप श्री हरिवंश के श्रीचरणों की शरण नहीं ली जाती, तब तक नित्य निकुंज की नित्य नवायमान रस-माधुरी को मन स्पर्श भी कैसे कर सकता है; अर्थात् वह उसे स्पर्श ही नहीं कर सकता।

