इतनी है पुरुषार्थ मेरो - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (413)

इतनी है पुरुषार्थ मेरो - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (413)

इतनी है पुरुषार्थ मेरो।
जप तप योग यग नहिं जानौ, साधन नियम बखेरौ।। [1]
इतनी बात बनि परै मोसौं, कबहुँ अबेर सबेरौ।
भोरी ढार-ढार दृग आँसू, नाम पुकार तेरौ।। [2]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (413)

भावार्थ:
श्री भोरी सखी जी, किशोरी जी से कह रही हैं कि मेरे से और कुछ तो बन नहीं पाता, न मैं जप जानती हूँ न ही तप, न योग और न ही कोई साधन नियम का निर्वाह मुझ से होता है। [1]
मैं तो केवल इतना ही पुरुषार्थ जानती हूँ अर्थात् मेरे से तो केवल इतना ही बन पाता है प्यारी, कि मैं साँझ सवेरे रो रो कर एक मात्र आपका नाम ही पुकारती रहूँ । [2]