तनहिं राखि सत्संग में मनहिं प्रेमरस भेव।
सुख चाहत हरिवंश हित, कृष्ण कल्पतरू सेव॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.2)
सुख चाहत हरिवंश हित, कृष्ण कल्पतरू सेव॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.2)
अपने तन को सत्संग में रखो और मन को प्रेम-रस में डुबाओ। यदि वास्तविक सुख चाहते हो, तो श्रीकृष्ण रूपी कल्पतरु का सेवन करो।

