धन - धन वृन्दावन जे बसैं  - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (44)

धन - धन वृन्दावन जे बसैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (44)

धन - धन वृन्दावन जे बसैं । [1]
न्यारे - न्यारे कहा वरनौं सब स्वर्ग - मुक्ति कौं हँसैं ॥ [2]
कहा आयक कहा जायक ह्याँके अति बड़भागी लसैं । [3]
 नागर ए देखत औरन के पाप सकल तन नसैं ॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (44)

वे जीव धन्य है, जो श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं। [1]

वृंदावन वासी जन अत्यंत न्यारे हैं जो स्वर्ग- मोक्ष आदि की कामना नहीं करते हैं अर्थात् वे स्वर्ग- मोक्ष आदि नहीं चाहते । [2]

वे जीव किसी और स्थान में आने-जाने में भी अपनी रुचि नहीं रखते। वे बड़भागी जन वृंदावन को त्याग कर न तो कहीं आते हैं न ही कहीं जाते हैं। [3]

श्री नागरीदास जी कहते हैं की वृन्दावन वासियों के दर्शन मात्र से तन के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। [4]