वृंदाटवी जयति कामगवी-सुरद्रु चिन्तामणीनगणितानपि तुच्छयन्ती।
श्रीशंकरद्रुहिणमुख्य सुरेन्द्रवृन्ददुर्ज्ञेय दिव्यमहिमैक रजःकणेन।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.36)
श्रीशंकरद्रुहिणमुख्य सुरेन्द्रवृन्ददुर्ज्ञेय दिव्यमहिमैक रजःकणेन।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.36)
लक्ष्मी, शंकर, ब्रह्मा, आदि श्रेष्ठ सुरगण जिसकी अप्राकृत महिमा को कदापि नहीं जान सकते, एक रज-कण के द्वारा ही जो अगणित कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्ता मणि के समूह को भी तुच्छ करती है -उस श्री वृन्दाटवी की जय हो।

