राधा माधव भैंट भई - श्री सूरदास, सूरसागर, द्वारिका चरित (50)

राधा माधव भैंट भई - श्री सूरदास, सूरसागर, द्वारिका चरित (50)

(राग आसावरी)
राधा माधव भैंट भई ।
राधा माधव माधव राधा,
कीट - भंग - गति होई जो गई ॥ [1]
माधव राधा के रंग राचे, राधा माधव रंग रई ।
माधव राधा प्राति निरंतर, रसना कही न गई ॥ [2]
विहंसि कह्यौ हम तुम नहीं, अन्तर यह कहि व्रज पठई ।
'सूरदास' प्रभु राधा माधव वृज विहार नित नई नई ॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर, द्वारिका चरित (50)

प्रस्तुत पद में श्री सूरदास जी, राधा माधव की मिलन लीला का वर्णन करते कहते हैं कि, "श्री राधा और श्री कृष्ण जब मिलते हैं (राधा कृष्ण बन जाते हैं और कृष्ण राधा बन जाती हैं ) तो उनके रूप एक समान हो जाते है अर्थात् जिस प्रकार भृंगी कीट दूसरे कीट को भी भृंगी ही बना देता हैं वैसे ही राधा माधव एक ही समान हो जाते हैं। [1]
श्री सूरदास जी कहते है कि श्री कृष्ण जब श्री राधा का रूप धारण करते हैं तो श्री राधा भी श्री कृष्ण रूप में हो जाती है। श्री राधा माधव की प्रीति (प्रेम) निरंतर बना ही रहता हैं जिसका वर्णन करना असंभव हैं। [2]
बृज विहार की लीला का वर्णन करते हुए श्री सूरदास जी कहते हैं कि राधा माधव दोनों हंसते हैं और कहते हैं, "आप और मैं एक हैं, कभी अलग नहीं होते हैं, और फिर वे एक साथ बृज में बिहार करते हैं। इस लीला को निरख कर श्री सूरदास जी कहते हैं, "श्री राधा-माधव का बृज विहार सदा नित्य नवीन हैं।" [3]