अति सुरूप सुकुवाँर तन, नव किसोर सुखरासि।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मन्द मृदु हासि॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (27)
जहाँ परमसुन्दर, अनन्त सुख, रूप और रस की निधि सुकुमार युगल अपनी मृदु, मनोहर मुस्कान से समस्त सखियों को मोहित करते हैं।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मन्द मृदु हासि॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (27)
जहाँ परमसुन्दर, अनन्त सुख, रूप और रस की निधि सुकुमार युगल अपनी मृदु, मनोहर मुस्कान से समस्त सखियों को मोहित करते हैं।

