तेरी ह्वै अब कौन सौं डरि हौं। [1]
नर्कन की न कछू मोहि चिन्ता, रुचि ऐहै सोई करिहौं। [2]
डर न कछू इंद्रिन कौ मन कौ, अब स्वछन्द विचरिहौं॥ [3]
सोच न पोच कहाये जग में, यम की भीति न धरिहौं। [4]
जानत हों तुम आइ अबहुँ हठ, भोरी बाँह पकरिहौं॥ [5]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (418)
श्री भोरी सखी जी इस पद में किशोरी जी की कृपा का वर्णन करते हुए कहती है, हे किशोरी जू ! आपके होते हुए मुझे किसी से किसी भी प्रकार का कोई भय (डर) नहीं है। [1]
मुझे नरक की भी चिंता नहीं है, यदि आपकी इच्छा हो कि मैं अनंत काल तक नरक में रहूँ तो आप अपनी इच्छा ही पूर्ण करना, जो रुचि आए आप वो करें। [2]
अब मैं मन इन्द्रियों की भी परवाह न करते हुए, बेपरवाह विचरण करती (घूमती) हूं। [3]
न मुझे जग की कोई परवाह है (कि लोग क्या कहेंगे इत्यादि), न यम (मृत्यु) का इतना सा भी भय है। [4]
हे किशोरी जू ! मुझे ज्ञात है अब आप हठ करके (ज़बरदस्ती) आकर मेरी बाँह पकड़ेंगी अर्थात् मुझे संभालेंगी। [5]
नर्कन की न कछू मोहि चिन्ता, रुचि ऐहै सोई करिहौं। [2]
डर न कछू इंद्रिन कौ मन कौ, अब स्वछन्द विचरिहौं॥ [3]
सोच न पोच कहाये जग में, यम की भीति न धरिहौं। [4]
जानत हों तुम आइ अबहुँ हठ, भोरी बाँह पकरिहौं॥ [5]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (418)
श्री भोरी सखी जी इस पद में किशोरी जी की कृपा का वर्णन करते हुए कहती है, हे किशोरी जू ! आपके होते हुए मुझे किसी से किसी भी प्रकार का कोई भय (डर) नहीं है। [1]
मुझे नरक की भी चिंता नहीं है, यदि आपकी इच्छा हो कि मैं अनंत काल तक नरक में रहूँ तो आप अपनी इच्छा ही पूर्ण करना, जो रुचि आए आप वो करें। [2]
अब मैं मन इन्द्रियों की भी परवाह न करते हुए, बेपरवाह विचरण करती (घूमती) हूं। [3]
न मुझे जग की कोई परवाह है (कि लोग क्या कहेंगे इत्यादि), न यम (मृत्यु) का इतना सा भी भय है। [4]
हे किशोरी जू ! मुझे ज्ञात है अब आप हठ करके (ज़बरदस्ती) आकर मेरी बाँह पकड़ेंगी अर्थात् मुझे संभालेंगी। [5]

