मनहु द्रु मन तें सुमन झरि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (2)

मनहु द्रु मन तें सुमन झरि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (2)

(दोहा)
मनहु द्रु मन तें सुमन झरि, परत हरत मन मैंन।
देखहु री इन दुहुन की, बतरावनि सुख दैन॥

(पद)
देखि री दुहुनि की सहज बतरावनी। [1]
मनहु दिबि द्रु मन तें सुमन झरि-झरि परत,
हरत मन परस्पर बरन उचरावनी॥ [2]
लागत कैसी रुचिर रदन छबि बदन में,
मदन मनमोहिनी मोद उपजावनी। [3]
श्रीहरिप्रिया परम रस-प्रेम की परनि में,
परि रहे करि रहे विनय विनयावनी॥ [4]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (2)

(दोहा)
हे सखी! इन दोनों की मधुर वार्ताएँ कितना सुख प्रदान करने वाली हैं, मानो दो कल्प-वृक्षों से पुष्पों की वर्षा हो रही हो। इनकी ये बातें कामदेव के मन को भी सम्मोहित करने वाली हैं।

(पद)
हे सखी ! तू इन दोनों की मधुर वार्तालाप को तनिक आस्वादन तो कर। [1]

मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानों दो कल्प वृक्षों से फूल झर झर कर पड़ रहे हों, वार्ता उच्चारण मात्र से ही इन दोनों के मन परस्पर मोहित हो जाते हैं। [2]

ज्यों ही वर्णों के उच्चारण से ओष्ठ खुलते हैं त्यों ही सुन्दर दान्तों की पंक्तियाँ अत्यन्त शोभायमान होती हैं। हे सखी ! मुख मण्डल पर इन दाँतों की पंक्ति की शोभा कैसी मनोहर प्रतीत होती है जिससे कामदेव का मन भी मोहित हो जाता है। और हमारा चित्त भी आह्लादित हो जाता है। [3]

श्रीहरि एवं प्रिया प्रेम के भी परम रस अर्थात् दिव्य काम की सरिता में अवगाहन कर रहे हैं। इसलिये ये दोनों एक दूसरे के अति आधीनता प्रकट करते हुए वार्तालाप कर रहे हैं। [4]