डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (47)

डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (47)

डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि, 
ऐसी सुकुमारी नैन-प्रान हूते प्यारी है। [1]
माधुरी सहज कछु कहत न बनि आवै, 
नैकुही के चितवत चकित बिहारी है॥ [2]
कौन भाँति मुख की अनूप काँति सरसाति, 
करत विचार तऊ जाति न बिचारी है। [3]
'हित ध्रुव’ मन परयौ रूप के भँवर माँझ, 
नेह बस भये सुधि देह की बिसारी है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (47) 

इस आशंका से ही कि मेरी दृष्टि का प्रिय पर भार न पड़े, प्रियतम श्रीलाल जी प्रिया को दृष्टि भर कर नहीं देखते हैं। सुकुमारी प्रिया, प्रियतम को नयन एवं प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। [1]

उनका सहज माधुर्य ऐसा है, जो कहने में नहीं आता, जिसकी तनिक सी रूप-छटा को देख कर भी लाल चकित रह जाते हैं। [2]

वे विचारते रहते हैं कि प्रिया के श्रीमुख की कान्ति कैसी अनुपम और कितनी सरस है, फिर भी वे इस रूप-रस की गहनता की सीमा को नहीं आँक पाते हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस प्रकार प्रियतम का मन प्रिया-रूप के भंवर में जा पड़ा है, वे प्रेम के वशीभूत हुए देहानुसन्धान रहित हो गए हैं। [4]