(सवैया)
मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। [1]
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ [2]
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन। [3]
जौ खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥ [4]
- श्री रसखान
इस सवैया में श्री रसखान जी ने ब्रज के प्रति अपनी अटूट प्रेम-भावना व्यक्त की है।
यदि मैं मनुष्य रूप में जन्म लूँ, तो ग्वालों के बीच गोकुल गाँव में ही वास करूँ। [1]
यदि मैं पशु बनूँ, तो नंदबाबा की उन गौओं के बीच चरूँ, जिन्हें स्वयं श्रीकृष्ण चराते हैं। [2]
यदि मैं पत्थर बनूँ, तो गोवर्धन पर्वत का बनूँ, जिसे श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका पर धारण किया था। [3]
और यदि मैं पक्षी बनूँ, तो यमुना तट के कदंब की डाल पर अपना बसेरा बनाऊँ। [4]
मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन। [1]
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ [2]
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो कियो हरिछत्र पुरंदर धारन। [3]
जौ खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन॥ [4]
- श्री रसखान
इस सवैया में श्री रसखान जी ने ब्रज के प्रति अपनी अटूट प्रेम-भावना व्यक्त की है।
यदि मैं मनुष्य रूप में जन्म लूँ, तो ग्वालों के बीच गोकुल गाँव में ही वास करूँ। [1]
यदि मैं पशु बनूँ, तो नंदबाबा की उन गौओं के बीच चरूँ, जिन्हें स्वयं श्रीकृष्ण चराते हैं। [2]
यदि मैं पत्थर बनूँ, तो गोवर्धन पर्वत का बनूँ, जिसे श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका पर धारण किया था। [3]
और यदि मैं पक्षी बनूँ, तो यमुना तट के कदंब की डाल पर अपना बसेरा बनाऊँ। [4]

