धन - धन वृन्दावन जिनको मन । [1]
वृन्दावन हित तरफत व्याकुल परबस दूरि धरयौ तन ॥ [2]
वृन्दावन कौ ध्यान हिये में, वृन्दावन को गावैं । [3]
वृन्दावन वासिन सौं "नागर" प्रेमपुलकि लपटावैं ॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (46)
वे जीव धन्य है जिनका मन नित्य श्री वृन्दावन धाम में रहता है। [1]
वृन्दावन से प्रेम होने के कारण उनका तन दूर रहकर वृन्दावन के लिए तड़पता रहता है। [2]
उनके हृदय में वृन्दावन का ध्यान तथा मुख पर वृन्दावन का ही गुणगान रहता है। [3]
श्री नागरीदास जी उन वृन्दावन वासियों को प्रेमपूर्वक ह्रदय से लगाते है। (ऐसे धन्य जीवों को भी नागरीदास जी ने वृंदावन वासी ही कहा है) [4]
वृन्दावन हित तरफत व्याकुल परबस दूरि धरयौ तन ॥ [2]
वृन्दावन कौ ध्यान हिये में, वृन्दावन को गावैं । [3]
वृन्दावन वासिन सौं "नागर" प्रेमपुलकि लपटावैं ॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (46)
वे जीव धन्य है जिनका मन नित्य श्री वृन्दावन धाम में रहता है। [1]
वृन्दावन से प्रेम होने के कारण उनका तन दूर रहकर वृन्दावन के लिए तड़पता रहता है। [2]
उनके हृदय में वृन्दावन का ध्यान तथा मुख पर वृन्दावन का ही गुणगान रहता है। [3]
श्री नागरीदास जी उन वृन्दावन वासियों को प्रेमपूर्वक ह्रदय से लगाते है। (ऐसे धन्य जीवों को भी नागरीदास जी ने वृंदावन वासी ही कहा है) [4]

