व्याकुल बिरह बिहार बिनु, नख सिख लोभी लीन।
श्रीबिहारिनिदास अंग सिथिलई, स्वासनि गिनत अधीन॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (136)
हे सखी! रसिक-शिरोमणि लाल जी रस-बिहार के नख से शिख तक लोभी होकर ऐसे आधीन रहते हैं कि यदि थोड़ा-सा भी विहार में व्यवधान पड़ जाए तो वे व्याकुल हो उठते हैं। उनके श्रीअंग ऐसे शिथिल पड़ जाते हैं कि हम सब सहचरियाँ उनकी स्वांसों को गिनने लगती हैं। इससे यह बात निश्चित हो जाती है कि लाल जी का जीवनस्वरूप एकमात्र हमारी प्राण-लाड़ली श्रीप्यारीजू ही हैं, और वे नित्य श्री राधारानी की दासता करते हैं।
श्रीबिहारिनिदास अंग सिथिलई, स्वासनि गिनत अधीन॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (136)
हे सखी! रसिक-शिरोमणि लाल जी रस-बिहार के नख से शिख तक लोभी होकर ऐसे आधीन रहते हैं कि यदि थोड़ा-सा भी विहार में व्यवधान पड़ जाए तो वे व्याकुल हो उठते हैं। उनके श्रीअंग ऐसे शिथिल पड़ जाते हैं कि हम सब सहचरियाँ उनकी स्वांसों को गिनने लगती हैं। इससे यह बात निश्चित हो जाती है कि लाल जी का जीवनस्वरूप एकमात्र हमारी प्राण-लाड़ली श्रीप्यारीजू ही हैं, और वे नित्य श्री राधारानी की दासता करते हैं।

