न्यारौ है सब लोक तें, वृन्दावन निज गेह।
खेलत लाड़िली लाल जहाँ, भींजे सरस सनेह॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (28)
श्री राधामाधव युगल का निज-गृह स्वरूप यह श्रीवृन्दावन सब लोकों से न्यारा और सर्वोपरि है, जहाँ युगल सहज प्रेम में मत्त होकर सतत विहार करते हैं।

