(राग विहागरौ)
बंदे श्रीवृन्दावन की भूमि।
ललित लतानि कुंदनमनि खाँची बेलि द्रुमनि रहीं झूमि।। [1]
केलि निकुंज नागरी नागर बदनचंद कौं चूमि।
श्रीरसिक रूप दंपति छबि संपति सुरंग रंग अलि घूमि।। [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (87)
बंदे श्रीवृन्दावन की भूमि।
ललित लतानि कुंदनमनि खाँची बेलि द्रुमनि रहीं झूमि।। [1]
केलि निकुंज नागरी नागर बदनचंद कौं चूमि।
श्रीरसिक रूप दंपति छबि संपति सुरंग रंग अलि घूमि।। [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (87)
श्री वृन्दावन की भूमि को वंदन (प्रणाम) है। जहाँ ललित लताएं, द्रुम,बेल आदि कुंदन मणि की तरह प्रतीत हो रही हैं एवं (झूम रही हैं) आनंदित हो रहे हैं। [1]
जहाँ केलि लीला करते हुए नागरी-नागर (प्रिया-प्रियतम) आपस में आलिंगन कर रहे हैं। श्री रसिकसखी जी दम्पति (प्रिया-प्रियतम) की सुरंग रंगों की छवि को अपने ह्रदय में सम्पति रूप में विराजित करके विचरण कर रहे हैं। [2]
जहाँ केलि लीला करते हुए नागरी-नागर (प्रिया-प्रियतम) आपस में आलिंगन कर रहे हैं। श्री रसिकसखी जी दम्पति (प्रिया-प्रियतम) की सुरंग रंगों की छवि को अपने ह्रदय में सम्पति रूप में विराजित करके विचरण कर रहे हैं। [2]

