हमारी राधे, दीनन की रखवार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

हमारी राधे, दीनन की रखवार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

हमारी राधे, दीनन की रखवार | [1]
दीन पुकार सुनत ही धावति, तनिक न लावति बार || [2]
जोगी जपी तपी साधन - बल, खोजत निपट गमार | [3]
पंच प्रपंच न छूटत रंचक, बहे सिद्धि मझधार || [4]
जेहि रस लगि हरि हर तरसत सो, बरसत येहि दरबार | [5]
पियत ‘कृपालु’ सोइ रस जापर, कृपा करति सुकुमार || [6]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य-माधुरी (95)

हमारी कीर्ति - कुंवरि राधिका दीनों की रक्षा के हेतु सदा कटिबद्ध रहती हैं | [1]

दीनों की करुण - पुकार को सुनते ही तत्क्षण ही विह्वल होकर उसके पास आ जाती हैं | [2]

अष्टांग - योग करने वाले, विविध प्रकार के जप करने वाले एवं घोर तपश्चर्या करने वाले मूर्खतावश अपनी साधना के बल से तुमको पाना चाहते हैं | [3]

किन्तु उनकी पंच - ज्ञानेन्द्रियों के विषयों की आत्यन्तिक निवृति नहीं हो पाती एवं वे अणिमा, लघिमा, गरिमा आदि अष्ट - महासिद्धियों के चक्कर में पड़कर अपने लक्ष्य को खो बैठते हैं | [4]

जिस प्रेम रस के लिए विष्णु, शंकर आदि भी तरसते हैं वही प्रेमरस इस दरबार में दीनों के लिए अकारण ही बरसता रहता है | [5]

‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि इस रस का पान वही कर सकता है, जिस पर तुम अकारण ही कृपा कर देती हो | [6]