करनिहितकपोलो नित्यमश्रूणि मुञ्चन् परिह्नतजनसंगोऽरोच्यमानानुयानः।
प्रतिपद बहुलार्त्त्या राधिकाकृष्णदास्ये वसति परमधन्यः कोऽपि वृन्दावनेऽस्मिन्।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.33)
नित्य कपोल देश पर हाथ रखे हुए अश्रु प्रवाह करते करते निसंग होकर एवं सेवक-अनुचर रहित हो कर प्रतिक्षण व्याकुलता पूर्वक जो श्रीराधा-कृष्ण के दास्य-रस में निमग्न होकर इस श्रीवृन्दावन में वास करता है, वही परम धन्य है।
प्रतिपद बहुलार्त्त्या राधिकाकृष्णदास्ये वसति परमधन्यः कोऽपि वृन्दावनेऽस्मिन्।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.33)
नित्य कपोल देश पर हाथ रखे हुए अश्रु प्रवाह करते करते निसंग होकर एवं सेवक-अनुचर रहित हो कर प्रतिक्षण व्याकुलता पूर्वक जो श्रीराधा-कृष्ण के दास्य-रस में निमग्न होकर इस श्रीवृन्दावन में वास करता है, वही परम धन्य है।

