लालन एक विनय सुनिये, अब मेरी गलिन में आइये ना - ब्रज की सवैया

लालन एक विनय सुनिये, अब मेरी गलिन में आइये ना - ब्रज की सवैया

लालन एक विनय सुनिये, अब मेरी गलिन में आइये ना। [1]
आइये तो तुम करुणा करिकै, हँसि टेरि सुनाइये गाइये ना॥ [2]
गाइये तो अधरन धरि कै, मुरली यह मन्द बजाइये ना। [3]
तरसाइये ना उर प्रेम बिथा, पुनि आइये तो फिर जाइये ना॥ [4]
- ब्रज के सवैया 

हे बाँकेबिहारी! बार-बार का यह संयोग-वियोग अब हमें नहीं सुहाता, इसलिए हम आपसे निवेदन करते हैं—अब हमारी गली में न आइए। [1]

यदि आना ही है, तो करुणा करके हँसते हुए प्रेमभरी बातें न कीजिए। [2]

और यदि बातें करते हैं, तो अपनी मोहिनी मुरली की मधुर तान न छेड़िए। [3]

यदि मुरली बजाएँ भी, तो हमारे हृदय में प्रेम की व्याकुलता न जगाइए; और यदि प्रेम जगाएँ तो फिर लौटकर कभी हमें छोड़कर मत जाइए। [4]