एकहि तन मन एक ही - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (1)

एकहि तन मन एक ही - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (1)

(राग भैरव)
(दोहा)
एकहि तन मन एक ही, साँचे ढरी सुढंग ।  
जोरी अद्भुत दुहुन की, रँगी सहज सुखरंग॥  
(पद)
सहज सुख रंग की रुचिर जोरी । [1]
अतिहि अद्भुत कहूँ नाहि देखी सुनी सकल गुन कला कौसल किसोरी ॥ [2]
एकहि द्वै जु द्वै एकही दिपहिं दिन किहिं साँचे निपनई करि सुढोरी । [3]
श्रीहरिप्रिया दरस हित दोय तन दरसवत एक तन एक मन एक दोरी ॥ [4]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (1)

(दोहा)
रसिक-दम्पति की यह अद्भुत युगल-छवि स्वाभाविक सुख से रञ्जित है और किसी अनिर्वचनीय साँचे में इस प्रकार उत्तम रीति से ढली हुई है जिससे इन दोनों के तन और मन पूर्णतः एकाकार हो रहे हैं।

(पद)
सहज सुख रंग से रञ्जित यह जोरी ऐसी सुन्दर और अद्भुत है जैसी न तो कहीं देखी न हीं कही सुनी । इनमें श्रीप्रियाजू रस सम्बन्धी सब गुणों तथा कोक कलाओं में अत्यन्त चतुरा हैं । [1 & 2]

यह जोरी न जाने किस अनिर्वचनीय सांचे में किस निपुणता से ढाली गई है जिससे यह एक होकर दो और दो होकर सदा एक प्रकाशमान रहते हैं । [3]

हे सखी री ! श्रीहरि एवं प्रिया के दिव्य मङ्गल विग्रह केवल देखने मात्र में ही दो हैं वास्तव में तो इन दोनों का तन तथा मन एक ही है । इनका एक ही स्वरूप दर्पण के बिम्ब तथा प्रतिविम्ब की भांति दो स्वरूपों से भान होता है । [4]