मेरो मन अनत कहां सुख पावै - श्री सूरदास, सूरसागर, विनय तथा भक्ति (25)

मेरो मन अनत कहां सुख पावै - श्री सूरदास, सूरसागर, विनय तथा भक्ति (25)

(राग सारंग)
मेरो मन अनत कहां सुख पावै। [1]
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥ [2]
कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै। [3]
परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥ [4]
जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै। [5]
सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥ [6]

- श्री सूरदास, सूरसागर, विनय तथा भक्ति (25)

श्री सूरदास जी कहते हैं, मेरे हृदय को और कहाँ सुख मिलेगा? (अर्थात् श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त कहीं ओर सुख नहीं मिल सकता।) [1]

एक पक्षी जो जहाज पर रहता है, वह उड़ सकता है लेकिन वापस घूमकर वह उसी जहाज पर आ जाता है। [2]

श्री सूरदास जी कहते हैं कि कमल के समान आँखों वाले श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी अन्य देवता के पीछे क्यों भागना? [3]

यदि आप प्यासे हैं, तो क्या आप मूर्खतापूर्वक शुद्ध गंगा को छोड़ देंगे और एक कुएं का सहारा लेंगे? [4]

जब एक मधुमक्खी ने कमल के फूल से मीठा अमृत रस लिया है तो वह करेले का रस क्यों खाएगी? [5]

सूरदास जी कहते हैं कि "प्रभु रूपी कामधेनु गाय को छोड़कर बकरी का दूध क्यों पिए?" [6]