जै जै श्रीबनराज हमारे - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त के पद  (114)

जै जै श्रीबनराज हमारे - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त के पद (114)

(राग गौरी)
जै जै श्रीबनराज हमारे। [1]
जिनकी कृपा बिहार बिलोकयौ श्रीहरिदास सम्हारे।। [2]
छिन छिन नई नई प्रीति प्रिया की प्राननि हूँ तें प्यारे। [3]
श्रीरसिकसखी अंग संग सहजही कबहूँ होत न न्यारे।। [4]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त के पद  (114)

हमारे श्री बनराज (श्री वृंदावन धाम) की जय हो जय हो जिसकी अत्यंत कृपा से और स्वामी श्री हरिदास जी की संभाल (कृपा) से ही नित्य विहार लीला का दर्शन संभव हुआ है। [1 & 2]
श्री रसिकसखी जी कहते हैं कि स्वामिनी जू (श्री राधारानी) की नई नई प्रीति हमको प्राणों से भी प्यारी लगती है और वह हमारे अंग संग सहज ही रस बरसाती हैं, एवं उनका वियोग एक क्षण के लिए भी नहीं है। [3 & 4]