(सवैया)
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवौ निधि के, सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं॥ [1]
रसखान कबौं इन आँखिन सौं, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं॥ [2]
- श्री रसखान
ब्रजेश्वर श्रीकृष्ण के हाथों की लकुटी और कंबल पर तीनों लोकों का राज भी त्याज्य है।
आठों सिद्धियाँ और नौं निधियों का सुख भी उस मधुर रस के सामने फीका पड़ जाता है, जब नंदलाल ब्रज की गौ-चारण लीला में मग्न होते हैं। [1]
रसखान भाव-विभोर होकर कहते हैं—यदि कभी इन नयनों को ब्रज के वन-उपवन, बाग-बगिचों और कुंजों का दर्शन मिल जाए, तो करोड़ों स्वर्ण-मंडित महलों को भी मैं ब्रज की करील-कुंजों (कांटेदार) पर न्यौछावर कर दूँ। [2]
आठों सिद्धियाँ और नौं निधियों का सुख भी उस मधुर रस के सामने फीका पड़ जाता है, जब नंदलाल ब्रज की गौ-चारण लीला में मग्न होते हैं। [1]
रसखान भाव-विभोर होकर कहते हैं—यदि कभी इन नयनों को ब्रज के वन-उपवन, बाग-बगिचों और कुंजों का दर्शन मिल जाए, तो करोड़ों स्वर्ण-मंडित महलों को भी मैं ब्रज की करील-कुंजों (कांटेदार) पर न्यौछावर कर दूँ। [2]

