त्यक्त्वा संगं दूरतः स्त्रीपिशाच्याः - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.31)

त्यक्त्वा संगं दूरतः स्त्रीपिशाच्याः - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.31)

त्यक्त्वा संगं दूरतः स्त्रीपिशाच्याः सर्वाशानां मूलमुद्धृत्य सम्यक्।
दैवाल्लब्धेनैव निर्वाह्य देहं श्रीमद्वृन्दाकान ने जोषमास्स्व।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.31)

स्त्री-पिशाची का संग दूर से त्याग कर, समस्त वासनाओं को सम्यक् प्रकार से मूल से उच्छेद कर एवं दैवलब्ध-वस्तु, द्वारा देह-यात्रा का निर्वाह करते हुए श्री वृन्दावन में प्रीति पूर्वक वास कर।