मेरे विषै विसन वर वाम - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (132)

मेरे विषै विसन वर वाम - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (132)

मेरे विषै विसन वर वाम ।
तन गोरी मन भोरी नवल किसोरी राधा नाम ॥ [1]
निस बासर जागत सोवत चितवत अंग अंग अभिराम ।     
अंजन मंजन करत परम रुचि चोंप चौगुनी काम ॥ [2]
ताको हिलगि तजे मैं अपने कर्म धर्म धन धाम ।
दई पीठि सब जगतें लगतें पायौ बन विश्राम ॥ [3]
यह छबि छुयें भयौ हों छुतिहा छांडि दिये दुख दाम ।
लीने अंक निसंक रहत नित सदा सुहागिलि स्याम ॥ [4]
या रस बिन सब निरस निरासा ज्यों पसु प्यासौ घाम ।
श्रीबिहारीदास बिन रांडै डहकें हाड लपेटे चाम ॥ [5]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त के पद (132)

श्री बिहारिनदेव जी कह रहे हैं कि प्रेमी रसिको की चरण रज के प्रताप से मेरे प्राण और मन के विष (दुर्गुण) एवं व्यसन (दुराचरण) सर्वसिरोमनि, सर्वश्रेष्ठ एक मात्र श्री किशोरी जी के हो गए हैं। जो क्षण-क्षण नव-नवायमान नवकिशोरता से भरी, गौर छवि छटा है, तथा नवलकिशोरी श्री राधा जिनका नाम हैं। [1]

परम सुशोभित आपकी अंग अंग माधुरी को रात दिन सोते-जागते हम सतत् निहारते रहते हैं। जिनकी हम सभी प्रकार से निरंतर उत्साह (चाव) से सेवा करते रहते हैं। [2]

जिनके शरणागत होने के बाद हमने अपने कर्म, धर्म, धन-धान्य आदि सब का ही त्याग कर, संसार से विमुख होकर (पीठ देकर), उन्हीं के निजमहल श्री वृन्दावन में सतत विश्राम ले लिया है। [3]

जबसे आपकी कृपा हुई है, तब से मैं सबसे ऐसे अलग हो गया हूँ कि सारे सुख-स्वरूप धर्मों को दुखदायी समझ कर, भलीभाँति त्याग दिया है । परम सुहाग- सिरोमनि श्री लाल जी को आप सदा सर्वदा अपने अंक में अति निशंकता (निसंकोच) के साथ में रखती हैं । [4]

इस विहार रस के अतिरिक्त और जो भी अन्य रस है उनसे हम इस प्रकार अति निराश रहते हैं, जैसे किसी प्यासे पशु को रेगिस्तान (घाम) में बांध दिया जाए और वो शुष्क, नीरस रहता है। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि श्री बांके बिहारी जी के पूर्ण शरणागति के बिना जीव की कामुकता का पूर्णतया नाश नहीं हो सकता अर्थात् संसारी लोग चमड़ी से लिपटी हुई हाड-मांस की स्त्री के पीछे सदा ही रहते हैं । [5]