प्राणनाथ वृषभानुनन्दिनी श्रीमुखाब्जरसलोलषट्पद - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (3)

प्राणनाथ वृषभानुनन्दिनी श्रीमुखाब्जरसलोलषट्पद - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (3)

प्राणनाथ वृषभानुनन्दिनी श्रीमुखाब्जरसलोलषट्पद ।
राधिकापदतले कृतस्थिति- स्त्वां भजामि रसिकेन्द्रशेखर ॥

- श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (3)

हे, मेरे रसिक शेखर, श्री कृष्ण, आप नित्य ही श्री राधा (श्री राधा मुख) रस में डूबे हुए हैं, मैं केवल आपकी एक उद्देश्य से आराधना करता हूँ कि मुझे ऐसा अधिकारी बना दीजिए कि श्री वृष्णभानु नंदिनी श्री राधा के चरण कमल के नीचे कुछ लेश मात्र स्थान प्राप्त कर सकूँ ।