हित हरिवंश डरौं काके डर

हित हरिवंश डरौं काके डर

(जै श्री) हित हरिवंश डरौं काके डर, हौं नाहिन मति काँची॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्रीहित स्फुट वाणी (12)

श्रीहित हरिवंश जी कहते हैं अब मुझे किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मेरी बुद्धि कच्ची नहीं है अपितु भली भाँति परिपक्व, स्थिर और सुदृढ़ है।