आरति कीजै श्याम - सुन्दर की।
नंद के नंदन राधिका - वर की।। [1]
भक्ति करि दीप प्रेम कर बाती।
साधु संगति करि अनुदिन राती।। [2]
आरती ब्रज जुवति जूथ मन भावै।
श्याम लीला (श्री) 'हरिवंश हित' गावै।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (19)
भूमिकाः- यह आरती का पद है । श्रीहिताचार्य ने इस प्रकार की आरती के अवसर पर श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करने का विधान किया है जो साधु संग से प्रज्वलित की गई प्रेमाभक्तिमयी आरती के साथ स्वाभाविक ही है।
व्याख्याः - नन्दनन्दन राधिका वर की आरती करनी चाहिये। [1]
भक्ति के दीपक में प्रेम की बत्ती डालकर उसको प्रतिदिन साधु संग के द्वारा प्रकाशित करना चाहिये। [2]
यह आरती युवति यूथ (सखी समूह) के मन को रुचिकर होती है और श्रीहित हरिवंश इस अवसर पर श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करते हैं। [3]
नंद के नंदन राधिका - वर की।। [1]
भक्ति करि दीप प्रेम कर बाती।
साधु संगति करि अनुदिन राती।। [2]
आरती ब्रज जुवति जूथ मन भावै।
श्याम लीला (श्री) 'हरिवंश हित' गावै।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (19)
भूमिकाः- यह आरती का पद है । श्रीहिताचार्य ने इस प्रकार की आरती के अवसर पर श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करने का विधान किया है जो साधु संग से प्रज्वलित की गई प्रेमाभक्तिमयी आरती के साथ स्वाभाविक ही है।
व्याख्याः - नन्दनन्दन राधिका वर की आरती करनी चाहिये। [1]
भक्ति के दीपक में प्रेम की बत्ती डालकर उसको प्रतिदिन साधु संग के द्वारा प्रकाशित करना चाहिये। [2]
यह आरती युवति यूथ (सखी समूह) के मन को रुचिकर होती है और श्रीहित हरिवंश इस अवसर पर श्रीश्यामाश्याम की लीला का गान करते हैं। [3]

