सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै - श्री रसखान

सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै - श्री रसखान

(सवैया)
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै। [1]
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥ [2]
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तू पुनि पार न पावैं। [3]
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥ [4]
- श्री रसखान

जिन भगवान के गुणों का गान स्वयं शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र अनवरत करते हैं। [1]

जिन्हें वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद्य और अभेद्य बताते हैं। [2]

जिनके गुणों का गान करते-करते नारद और शुकदेव जैसे महर्षि भी थक गए, फिर भी जिनका पार नहीं पा सके। [3]

उन्हीं अनंत और अखंड प्रभु को प्रेम के बल से वशीभूत कर, ब्रज की गोपियाँ मात्र एक कटोरे छाछ पर नचा रही हैं। [4]