वृन्दाविपिन सुहावनौं, रहत एक रस नित्त।
प्रेम सुरंग रंगे तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (26)
यह मनभावन श्रीवृन्दावन अखण्ड आनन्दमय है, जहाँ अनुराग-रंग में रंगे एक प्राण दो मित्र सदा प्रेम-क्रीड़ा में परायण रहते हैं।
प्रेम सुरंग रंगे तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (26)
यह मनभावन श्रीवृन्दावन अखण्ड आनन्दमय है, जहाँ अनुराग-रंग में रंगे एक प्राण दो मित्र सदा प्रेम-क्रीड़ा में परायण रहते हैं।

