डोलत फिरत मुख बोलत में राधे राधे - श्री लाल बलबीर, श्री राधा शतक (96)

डोलत फिरत मुख बोलत में राधे राधे - श्री लाल बलबीर, श्री राधा शतक (96)

(कवित्त)
डोलत फिरत मुख बोलत में राधे राधे,
और जग जालन के ख्यालन सों हट रे। [1]
सोवत जागत मग जोवत में राधे राधे,
राधे रट राधे त्याग उर ते कपट रे॥[2]
'लाल बलबीर' धर धीर रट राधे राधे,
टरैं कोटि बाधे रट राधे झटपट रे। [3]
एरे मन मेरे चेत भूलिकें न हो अचेत,
राधे रट राधे रट राधे राधे रट रे॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (96)

डोलते, फिरते और मुख से कुछ भी बोलते समय नित्य ही "राधे राधे" जपो, और समस्त संसार के मिथ्या ख़्यालों से मन हटा कर नित्य ही इस अद्भुत "राधे राधे" नाम का जप करो। [1]

सोते, जागते, और किसी की प्रतीक्षा करते हुए भी "राधे राधे" रटो, एवं उर से कपट का त्याग करके श्री "राधे राधे" रटन करो। [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि धीरज बांध कर अर्थात् नित्य ही लंबे समय तक "राधे राधे" रटो, और अनंत कोटि बाधाएँ केवल श्री "राधे राधे" रटने से ही मिट जाती हैं, इसलिए इसे झटपट (शीघ्र) करो। [3]

हे मेरे मन, अब सचेत हो और भूल कर भी अचेत न होना, "राधा रट", "राधा रट", हर क्षण "राधा राधा" ही रट। [4]