श्रीबिहारीदास बिहार मैं, वेद न पावैं जांनि।
सखी जिवावैं प्रेम सौं, महा मधुर रस छांनि॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (420)
सखी जिवावैं प्रेम सौं, महा मधुर रस छांनि॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (420)
नित्य विहार का रस वेद भी नहीं जान सकते। इसे तो केवल वही जान सकते हैं, जिन्हें सखियाँ महा-मधुर रस को छानकर प्रेमपूर्वक जना दें।

