जयति श्री राधिके सकल सुख साधिके,
तरुनि मणि नित्य नौतन किशोरी।
कृष्ण तन नील घन रूप की चातकी,
कृष्ण मुख हिम किरण की चकोरी ।। [1]
कृष्ण दृग भृंग विश्राम हित पद्मिनी,
कृष्ण दृग मृगज बन्धन सु डोरी।
कृष्ण अनुराग मकरंद की मधुकरी,
कृष्ण गुण गान रस सिन्धु बोरी ।। [2]
परम् अदबुद अलौकिक मेरी गति,
लख मनसि साँवरे रंग अंग गोरी।
और आश्चर्य मैं कहूँ न देख्यो,
सुन्यो चतुर चौंसठ कला तदपि भोरी ।। [3]
विमुख पर चित्त ते चित्त जाको सदा,
करत निजनाह की चित्त चोरी ।
प्रकृत यह ‘गदाधर’ कहत कैसे बने,
अमित महिमा इते बुद्धि थोरी ।। [4]
- श्री गदाधर भट्ट
हे श्री राधिके, आप समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं, आप नित्य यौवन अवस्था को प्राप्त हुई मुकुट मणि हैं। आप श्री कृष्ण के नीले घन समान तन के रूप की चातकी हैं एवं श्री कृष्ण चंद्र मुख के किरण की चकोर हैं (श्री कृष्ण चंद्र मुख को चकोर की भाँति देखती रहती हैं) । [1]
आप उस कमल की भाँति हैं जिसे श्री कृष्ण के भृंग नयन नित्य रस लेते हैं एवं उस डोरी के समान हैं जिससे मृग (श्री कृष्ण के नयन) हमेशा बंधे रहते हैं ।आप वह मधुकरी हो जो नित्य ही श्री कृष्ण अनुराग पान करती हो । आप नित्य ही रस में सराबोर रहकर श्री कृष्ण गुण गान करती हो । [2]
मेरी गति परम अद्भुत एवं परम अलौकिक है क्यूँकि हमको आप मिली हो जो नित्य ही साँवरे श्री कृष्ण के रंग में रंगी रहती हो एवं स्वयं अंग से परम गोरी हो। इससे बड़ा आश्चर्य मैंने कहीं नहीं देखा कि आप चौंसठ कला में चतुर होते हुए भी अत्यंत भोरी हो। केवल आप ही अलबेली सरकार हो, आप जैसा तो कोई भी नहीं है । [3]
आप के जैसी सरकार एवं आपके जैसा चित्त (हृदय) कहीं भी नहीं है क्यूँकि आपने तो स्वयं श्री कृष्ण के चित्त को ही चुरा रखा है । श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि हे मेरी अलबेली सरकार, आपकी महिमा अनंत है और मेरी अत्यंत थोड़ी बुद्धि है इसलिए आपके विषय में बताना मेरे लिए असंभव है । [4]
तरुनि मणि नित्य नौतन किशोरी।
कृष्ण तन नील घन रूप की चातकी,
कृष्ण मुख हिम किरण की चकोरी ।। [1]
कृष्ण दृग भृंग विश्राम हित पद्मिनी,
कृष्ण दृग मृगज बन्धन सु डोरी।
कृष्ण अनुराग मकरंद की मधुकरी,
कृष्ण गुण गान रस सिन्धु बोरी ।। [2]
परम् अदबुद अलौकिक मेरी गति,
लख मनसि साँवरे रंग अंग गोरी।
और आश्चर्य मैं कहूँ न देख्यो,
सुन्यो चतुर चौंसठ कला तदपि भोरी ।। [3]
विमुख पर चित्त ते चित्त जाको सदा,
करत निजनाह की चित्त चोरी ।
प्रकृत यह ‘गदाधर’ कहत कैसे बने,
अमित महिमा इते बुद्धि थोरी ।। [4]
- श्री गदाधर भट्ट
हे श्री राधिके, आप समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं, आप नित्य यौवन अवस्था को प्राप्त हुई मुकुट मणि हैं। आप श्री कृष्ण के नीले घन समान तन के रूप की चातकी हैं एवं श्री कृष्ण चंद्र मुख के किरण की चकोर हैं (श्री कृष्ण चंद्र मुख को चकोर की भाँति देखती रहती हैं) । [1]
आप उस कमल की भाँति हैं जिसे श्री कृष्ण के भृंग नयन नित्य रस लेते हैं एवं उस डोरी के समान हैं जिससे मृग (श्री कृष्ण के नयन) हमेशा बंधे रहते हैं ।आप वह मधुकरी हो जो नित्य ही श्री कृष्ण अनुराग पान करती हो । आप नित्य ही रस में सराबोर रहकर श्री कृष्ण गुण गान करती हो । [2]
मेरी गति परम अद्भुत एवं परम अलौकिक है क्यूँकि हमको आप मिली हो जो नित्य ही साँवरे श्री कृष्ण के रंग में रंगी रहती हो एवं स्वयं अंग से परम गोरी हो। इससे बड़ा आश्चर्य मैंने कहीं नहीं देखा कि आप चौंसठ कला में चतुर होते हुए भी अत्यंत भोरी हो। केवल आप ही अलबेली सरकार हो, आप जैसा तो कोई भी नहीं है । [3]
आप के जैसी सरकार एवं आपके जैसा चित्त (हृदय) कहीं भी नहीं है क्यूँकि आपने तो स्वयं श्री कृष्ण के चित्त को ही चुरा रखा है । श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि हे मेरी अलबेली सरकार, आपकी महिमा अनंत है और मेरी अत्यंत थोड़ी बुद्धि है इसलिए आपके विषय में बताना मेरे लिए असंभव है । [4]

