फूलीं सब सखी देखि देखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (42)

फूलीं सब सखी देखि देखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (42)

(राग केदारौ)
फूलीं सब सखी देखि देखि। [1]
जच्छ किन्नर नागलोक देव स्त्रीं
रीझि रहीं भुव लेखि लेखि॥ [2]
कहत परस्पर नारि नारि सौं
यह सुन्दर्यता अव रेखि रेखि। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा ए कैसे हूँ
चितयैं परेखि रेखि॥ [4]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (42)

रसिक सखीगण हरिदासी सखी को लाडिली-लाल को लाड़-लड़ाते, दुलराते निहार अति प्रसन्न हो रही हैं । [1]
नैन कमल, मुख कमल, चरण कमल की सेवा में बिहारीजी मगन हैं। प्यारी की सुंदरता सुगंध युक्त की किरण तीनों लोकों में बिजली चमक भांति कौंध रही है। यक्ष, नाग, किन्नर, देव आदि लोकों की देवियाँ जो प्रिया जी की रस के यश को सुनकर मोहित थीं, वे आज उसी शोभा का पृथ्वी पर अवलोकन कर रीझ रही हैं । [2]
प्यारी जी पिय के कंधे पर झूल रही हैं, पिय प्रिया जी की रूप माधुरी का पान करते नहीं अघाते, उनके अंगों से बिखरती इत्र आदि दिव्य सुगंधि सखीगणों के रंध्रों में प्रवेश कर अलौकिक आनंद प्रदान कर रही है। रसिक सनेही प्रिया जी की रस उपासना में व्यस्त हैं। भूतल यानी पृथ्वी भी प्रिया की छवि देख तृण की लेखनी बना लिखने लगी- ऐसा सौन्दर्य न देखा न सुना। [3]
 हरिदासी सखी अपनी स्वामिनी श्यामाजी से कह रही हैं- ये कैसे प्रियतम है जिनकी चाह, हौसला बढ़ता ही जाता है। आपकी कृपा को चित्त धारण किये हए हैं। आपकी कृपा से अंग से अंग मिल कर मानो हिंडोले झूल रहे हैं तो भी परीक्षा करने की सीमा समाप्त ही नहीं होती। [4]