(कवित्त)
रूप की नौलासी प्यारी नाना रंग के सुभाइ,
भाइनि की मृदुताई कही न परति है। [1]
नैननिं के आगैं लाल लिये रहैं निसि दिन,
एकौ छिन मन तें न क्यौंहूँ बिसरति है॥ [2]
भीजिं-भीजिं जात पिय सुख के तरंगनि में,
जब प्रिया बातनि के रंग में ढरति है। [3]
'हित ध्रुव’ प्यारे जू की जीवन किसोरी गोरी,
छिन-छिन प्रीतम के मन कौं हरति है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (40)
रूप की फूल-छड़ी जैसी तन्वंगी प्रिया, ललित हाव-भावों से भरपूर हैं, और उनकी अद्भुत भाव-भंगिमाएँ एवं मृदुता भी अनिर्वचनीय हैं। [1]
रूप की नौलासी प्यारी नाना रंग के सुभाइ,
भाइनि की मृदुताई कही न परति है। [1]
नैननिं के आगैं लाल लिये रहैं निसि दिन,
एकौ छिन मन तें न क्यौंहूँ बिसरति है॥ [2]
भीजिं-भीजिं जात पिय सुख के तरंगनि में,
जब प्रिया बातनि के रंग में ढरति है। [3]
'हित ध्रुव’ प्यारे जू की जीवन किसोरी गोरी,
छिन-छिन प्रीतम के मन कौं हरति है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (40)
रूप की फूल-छड़ी जैसी तन्वंगी प्रिया, ललित हाव-भावों से भरपूर हैं, और उनकी अद्भुत भाव-भंगिमाएँ एवं मृदुता भी अनिर्वचनीय हैं। [1]
प्रियतम श्री लाल उन्हें सतत निहारते हैं और एक क्षण के लिए भी विस्मृत नहीं कर पाते हैं। [2]
जब कभी प्रिया सहज वार्ता के रंग में उल्लसित होती हैं, तब प्रियतम आनंद की तरंगों में सराबोर हो जाते हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि नवल किशोरी गौरांगी प्रिया श्री प्रियतम की जीवन हैं, जो प्रतिक्षण उनके मन का मोहन किया करती हैं। [4]

