राधिका कान्ह को ध्यान धरै तब कान्ह ह्वै राधिका के गुण गावै - श्री देव जी

राधिका कान्ह को ध्यान धरै तब कान्ह ह्वै राधिका के गुण गावै - श्री देव जी

(सवैया)
राधिका कान्ह को ध्यान धरै, तब कान्ह ह्वै राधिका के गुण गावै। [1]
त्यों असुबा बरसे बरसाने को, पाती लिखे लिखे गुण गावै॥ [2]
राधे ह्वै जाय घरीक में देव सु, प्रेम की पाती ले छाती लगावै। [3]
आपने आपही में उरझे, सुरझे उरझे समुझे समुझावै॥ [4]

- श्री देव जी

[यह श्री राधा रानी की महाभाव अवस्था का एक उदाहरण है]
सर्वप्रथम श्रीराधिका ध्यान में श्रीकृष्ण का स्मरण करती हैं और फिर उसी क्षण अपने आप को श्रीकृष्ण मानकर, स्वयं श्रीराधा की स्तुति करने लगती हैं। [1]

फिर कृष्ण भाव में डूबी हुई बरसाने का स्मरण करती हैं, नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगती है, और स्वयं को श्रीकृष्ण मानकर, श्रीराधा को (अपने आप को ही) प्रेममय पत्र लिख भेजती हैं। [2]

अगले ही क्षण इस पत्र को प्राप्त कर सोचती हैं कि श्रीकृष्ण ने उन्हें पत्र लिखा है और उस पत्र को देखकर हृदय से लगा लेती हैं। [3]

इस प्रकार श्रीराधा अपनी ही लीला में उलझती-सुलझती रहती हैं—स्वयं समझती हैं और स्वयं को समझाती भी हैं। [4]