जिन पद पंकज पर मधुप, मोहन द्रग मंडरात।
तिन की नित झाँकी करन, मेरौ मन ललचात॥
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (5.4)
जिन श्री राधा के चरण-कमलों पर श्रीकृष्ण के नयन नित्य ही मधुप की भाँति मण्डराते रहते हैं, उन्हीं श्री राधा के गोरे चरणों के नित्य दर्शन के लिए मेरा मन सदा ललचाता रहता है।
तिन की नित झाँकी करन, मेरौ मन ललचात॥
- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (5.4)
जिन श्री राधा के चरण-कमलों पर श्रीकृष्ण के नयन नित्य ही मधुप की भाँति मण्डराते रहते हैं, उन्हीं श्री राधा के गोरे चरणों के नित्य दर्शन के लिए मेरा मन सदा ललचाता रहता है।

