अरे मन मूरख निपट गवाँर - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा

अरे मन मूरख निपट गवाँर - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा

अरे मन! मूरख निपट गवाँर। [1]
बिगरत आपु बिगारत मो कहँ, नेकु न करत विचार।। [2]
कोटि-कल्प भटक्यो ज्यों शूकर, विष्ठा-विषय मझार। [3]
बिनु सेवा जहँ पाइए मेवा, गयो न तेहि दरबार।। [4]
दोउ कर-कमल पसारि निहारति, तोहिँ वृषभानुदुलार। [5]
अस अवसर नर देह सुदुर्लभ, मिलत न बारम्बार।। [6]
साधन बिनहुं 'कृपालु' द्रवत जो, को अस सरल उदार। [7]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (16)

भावार्थ- अरे मन! तू वास्तव में अत्यन्त ही मूर्ख एवं नासमझ है। [1]
तू आप अपना भी नाश कर रहा है, साथ ही मेरा भी नाश कर रहा है। तू इस विषय में थोड़ा सा भी विचार नहीं करता। [2]
तुझे सांसारिक विषय-वासना रूपी विष्ठा में शूकर की तरह भटकते हुए करोड़ो कल्प बीत गये, फिर भी कुछ भी न पा सका। [3]
जिन किशोरी जी के दरबार में बिना साधन के ही तू सब कुछ पा जाता, उस दरबार में तू हठवश कभी न गया। [4]
तुझे वृषभानुनंदिनी अपनी दोनों कोमल भुजाओं को पसारे प्रतीक्षा कर रही हैं। [5]
ऐसा अवसर एवं देवदुर्लभ मानव-देह तुझे बार-बार न मिल सकेगा। [6]
'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि वृषभानुनंदिनी के सिवा ऐसा सरल एवं उदार हृदय वाला और तुझे कौन मिलेगा जो बिना साधन के ही शरणागत को सदा के लिए अपना बना ले। [7]