ब्रह्मानन्दैकवादा: कतिचन् - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (147)

ब्रह्मानन्दैकवादा: कतिचन् - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (147)

ब्रह्मानन्दैकवादा: कतिचन् भगवद्वन्दनानन्द-मत्ता:,
केचिद् गोविन्द-सख्याद्यनुपम परमानन्द मन्ये स्वदन्ते ।
श्रीराधा-किङ्करीणां त्वखिल सुख-चमत्कार-सारैक-सीमा,
तत्पादाम्भोज राजन्नख - मणिविलसज्ज्योतिरेकच्छटापि।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (147)

कोई ब्रह्मानन्द वादी हैं, तो कोई भगवद्वन्दना ( दास्य-भाव ) में ही उन्मत्त हैं। कुछ लोग गोविन्द के सख्यादि (मैत्त्रि भाव) को ही परमानन्द मानकर उसके आस्वादन में लग रहे हैं किन्तु श्रीराधा-चरण-कमलों की शोभायमान् नख-मणि ज्योति की एक किरण मात्र ही श्रीराधा-किङ्करियों के लिये अखिल सुख-चमत्कार-सार की सीमा है।