फूलि चले दोउ फूलनि कुंज ते, फूलनि-फूलनि देखत आवैं । [1]
मनौं छबि के विवि चंद अनंद सौं, मंदहि-मंद मिले सुर गावैं ।। [2]
नूपुर भूषन की झनकार, सखी सुनि कैं चहुँ ओर तैं धावैं । [3]
रूप-सुधा रस प्रेम सुरंगहि, नैंन चकोरनि कौं 'ध्रुव’ प्यावैं।। [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (2.37)
फूलों की कुञ्ज से निकल कर प्रसन्न मन युगल-किशोर श्रीवन की पुष्प लताओं की शोभा को देखते हुए चले आ रहे हैं। [1]
वे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो छबि के युगल चन्द्रमा आनन्दोल्लास में भरे मधुर स्वरों में गान कर रहे हों। [2]
उनके नूपुर एवं भूषणों का मधुर स्वर श्रवण कर चारों ओर से सखियाँ सिमिट कर उनके समीप आने लगी हैं और उस समय तृषित चकोरवत् उनकी रूप-छबि का दर्शन करने में तल्लीन हैं । [3 & 4]
मनौं छबि के विवि चंद अनंद सौं, मंदहि-मंद मिले सुर गावैं ।। [2]
नूपुर भूषन की झनकार, सखी सुनि कैं चहुँ ओर तैं धावैं । [3]
रूप-सुधा रस प्रेम सुरंगहि, नैंन चकोरनि कौं 'ध्रुव’ प्यावैं।। [4]
- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, श्रृंगार शत (2.37)
फूलों की कुञ्ज से निकल कर प्रसन्न मन युगल-किशोर श्रीवन की पुष्प लताओं की शोभा को देखते हुए चले आ रहे हैं। [1]
वे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो छबि के युगल चन्द्रमा आनन्दोल्लास में भरे मधुर स्वरों में गान कर रहे हों। [2]
उनके नूपुर एवं भूषणों का मधुर स्वर श्रवण कर चारों ओर से सखियाँ सिमिट कर उनके समीप आने लगी हैं और उस समय तृषित चकोरवत् उनकी रूप-छबि का दर्शन करने में तल्लीन हैं । [3 & 4]

