आशापि नासाद्यत एव राधा-पादारविन्दार्चन - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.70)

आशापि नासाद्यत एव राधा-पादारविन्दार्चन - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.70)

आशापि नासाद्यत एव राधा-पादारविन्दार्चन इन्दिराद्यैः।
अहं तु वृन्दावन! ते प्रभावाद्भावानुबन्धे स्पृहयालुरस्मि।।

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.70)

लक्ष्मी आदि देवीगण भी श्रीराधा के चरणकमलों की सेवा की आशा तक भी नहीं कर सकतीं, किन्तु हे वृन्दावन! मैं आपके प्रभाव से किसी भी भाव-योग से प्रबल इच्छुक हो रहा हूँ।।70।।