नागरीदास जी राधारानी के अनन्य भक्त थे | नागरीदास जी ने बरसाने में गहवर वन में अपनी कुटिया बनाई जो आज मोर कुटी के नाम से प्रसिद्ध है एक दिन इसी स्थान पर उन्होंने अष्टसखियों सहित श्री राधा रानी के प्रत्यक्ष दर्शन हुए | नागरीदास जी प्रेम और सौंदर्य की अंतिम सीमा श्री किशोरीजी के साक्षात् दर्शन कर मूर्छित हो गए| उस स्थिति में श्री राधा ने उनसे कहा हम नित्य प्रति यहाँ खेलने आती हैं हमें अर्द्धरात्रि में भूख लगती है इस समय यदि हमें कुछ भोजन कराओ तो शांति हो हमको | इन्होने यही बात अपने पदों में लिखी है:
"भूखे हैं हम आधी रैन, या बिरियाँ स्वबावै तब चैन”
नागरीदास जी परम हर्षित होकर उसी समय श्री राधा को भोजन कराया और उसी दिन से अर्ध रात्रि के समय खीर और पूड़ियों का भोग रखने लगे|
"भूखे हैं हम आधी रैन, या बिरियाँ स्वबावै तब चैन”
नागरीदास जी परम हर्षित होकर उसी समय श्री राधा को भोजन कराया और उसी दिन से अर्ध रात्रि के समय खीर और पूड़ियों का भोग रखने लगे|

