श्रीवृन्दावन निधि सब सुख धांम । [1]
मन क्रम वचन अनन्य भजन बिनु नांमै गावै गुन ग्रांम ।। [2]
जांनि भक्ति फल मूल परम पद व्याज विषै छाँड़त नहीं भ्रांम। [3]
बाढत कर्म न घटत काहू के सेवत देवन सदा सकांम ।। [4]
याही तें धन दारा विवस रस बितवत वृथा गमावत जांम । [5]
श्रीबिहारीदास निरभै भज हरि पद चाहत छूट भयौ निहकांम।। [6]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी
जब तक ज्ञान-विवेक द्वारा मन से भली प्रकार विचार करके अद्भुत रसमय भूमि श्री वृन्दावन-निधि की शरण नहीं ली हैं, तब तक आपको वास्तविक बल, बुद्धि और विश्राम कैसे मिल सकता है? इस सर्वोपरि निज महल श्री धाम को मन, क्रम, वचन अनन्य भाव से भजन किए बिना नित्यविहार रस प्राप्ति के लिए केवल नाम-गुणों को गाने से क्या हो सकता है? [1 & 2]
आप परमपद के मूल-फल श्री भक्ति महारानी के स्वरूप को जानकर भी भ्रम में पड़े हो एवं ब्याज के समान और-और धर्मों की आस्था एवं विषयों को नहीं छोड़ रहे है। [3]
श्री बिहारिन देव जी साधकों से कहते है, कि जो जन (मनुष्य) कामनाओं में विवश होकर नाना-धर्म एवं देवी-देवताओं कि पूजा करता है, उनके कर्म कम होने के बजाय बढ़ते ही जाते है। [4]
इसी कारण ऐसे लोग धन-धाम, स्त्री-पुत्र आदि सांसारिक सुखों में फँस कर बहुत समय व्यर्थ ही कर देते है। [5]
यदि आप दुखदाई जगत में निष्काम होना चाहते हैं तो सबसे निर्भय-निश्चिंत होकर श्री हरि के चरण कमलों को सदाकाल भजन करो। [6]
मन क्रम वचन अनन्य भजन बिनु नांमै गावै गुन ग्रांम ।। [2]
जांनि भक्ति फल मूल परम पद व्याज विषै छाँड़त नहीं भ्रांम। [3]
बाढत कर्म न घटत काहू के सेवत देवन सदा सकांम ।। [4]
याही तें धन दारा विवस रस बितवत वृथा गमावत जांम । [5]
श्रीबिहारीदास निरभै भज हरि पद चाहत छूट भयौ निहकांम।। [6]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी
जब तक ज्ञान-विवेक द्वारा मन से भली प्रकार विचार करके अद्भुत रसमय भूमि श्री वृन्दावन-निधि की शरण नहीं ली हैं, तब तक आपको वास्तविक बल, बुद्धि और विश्राम कैसे मिल सकता है? इस सर्वोपरि निज महल श्री धाम को मन, क्रम, वचन अनन्य भाव से भजन किए बिना नित्यविहार रस प्राप्ति के लिए केवल नाम-गुणों को गाने से क्या हो सकता है? [1 & 2]
आप परमपद के मूल-फल श्री भक्ति महारानी के स्वरूप को जानकर भी भ्रम में पड़े हो एवं ब्याज के समान और-और धर्मों की आस्था एवं विषयों को नहीं छोड़ रहे है। [3]
श्री बिहारिन देव जी साधकों से कहते है, कि जो जन (मनुष्य) कामनाओं में विवश होकर नाना-धर्म एवं देवी-देवताओं कि पूजा करता है, उनके कर्म कम होने के बजाय बढ़ते ही जाते है। [4]
इसी कारण ऐसे लोग धन-धाम, स्त्री-पुत्र आदि सांसारिक सुखों में फँस कर बहुत समय व्यर्थ ही कर देते है। [5]
यदि आप दुखदाई जगत में निष्काम होना चाहते हैं तो सबसे निर्भय-निश्चिंत होकर श्री हरि के चरण कमलों को सदाकाल भजन करो। [6]

