भाग्यवान वृषभानुसुता सी को तिय त्रिभुवन माहीं - श्री हरिराय जी

भाग्यवान वृषभानुसुता सी को तिय त्रिभुवन माहीं - श्री हरिराय जी

(राग पीलू)
भाग्यवान वृषभानुसुता सी, को तिय त्रिभुवन माहीं।
जाकौं पति त्रिभुवन मनमोहन, दिएँ रहत गलबाहीं॥ [1]
ह्वै अधीन सँगही सँग डोलत, जहां कुंवरि चलि जाहीं।
‘रसिक’ लख्यौ जो सुख वृंदावन, सो त्रिभुवन मैं नाहीं॥ [2]

- श्री हरिराय जी

इस संसार में श्रीराधा जैसी भाग्यशालिनी कोई नहीं, जिनके प्रियतम, तीनों लोकों के अधिपति श्रीकृष्ण, सदैव उनके कंधों पर प्रेम से गलबहियां डाले रहते हैं। [1]

जहां भी किशोरीजी पग बढ़ाती हैं, वहां श्यामसुंदर उनके अधीन होकर संग-संग चलते हैं। रसिकों ने जो अद्वितीय सुख वृंदावन में पाया है, वह त्रिलोक में भी दुर्लभ है। [2]