हमें नहिं काहू सों कछु काम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,प्रेम रस मदिरा

हमें नहिं काहू सों कछु काम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,प्रेम रस मदिरा

हमें नहिं काहू सों कछु काम। [1]
दास स्वामिनी श्यामा जू को, सुमिरत आठों याम ।। [2]
उमा रमा ब्रह्माणी वाणी, जाकी रहति गुलाम । [3]
कबहुँक रह वृंदावन कबहुँक, श्री बरसानो धाम ।। [4]
निंदा अस्तुति भार डार हम, गावत राधे नाम । [5]
सोवत नित ‘कृपालु’ श्यामा की, गोद पसारे पाम ।। [6]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धान्त माधुरी (138)

भावार्थ - हमारा किसी से कुछ प्रयोजन नहीं है | [1]
हम तो एकमात्र स्वामिनी किशोरी जी के ही दास हैं | इन्हीं का निरन्तर स्मरण करते हैं। [2]
जिनकी दासता सदा ही उमा, रमा, ब्रह्माणी और सरस्वती करती रहती हैं | [3]
हम कभी वृन्दावन रहते हैं एवं कभी श्री बरसाने धाम में रहते हैं | [4]
निंदा एवं प्रशंसा की परवाह न करते हुए ‘राधे राधे’ गाते रहते हैं | [5]
‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम तो अपना सर्वस्व समर्पित करके किशोरी जी की गोद में पैर फैला कर सदा ही सोते रहते हैं | [6]