(राग केदारौ)
डोल झूलत दुलहिनि दूलहु। [1]
उड़त अबीर कुमकुमा छिरकत
खेल परस्पर सूलहु ॥ [2]
बाजत ताल रबाब और बहु तरनि तनया कूलहु। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी कौ
अनतब नाहिंने फूलहु ॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (48)
सखी सखी से कह रही है - दोनों प्रिया प्रियतम नये-दुल्हा दुलहिन, पुष्पों से शोभित निकुंज प्रांगण में नवीन भावों के श्रृंगार कर झूला झूल रहे हैं। [1]
होली का महोत्सव, चाह रूपी प्यारे का अबीर उड़कर प्यार से लिपट रहा है एवं प्यारी जी के कुमकुम का रंग प्यारे पर छिड़काव कर रहा है। यह होली का खेल अति रसमय है एवं दोनों को हँसने हँसाने में सहायक है। [2]
डोल झूलने के क्रम में अंग अंग स्पर्श से बाजे बज रहे हैं। आभूषणों के आपस में टकराने से मधुर झंकार की ध्वनि उठ रही है। यमुना जी के तट पर दोनों के परम सुंदर तन परस्पर लिपटे हुए सुखी को आनंदित कर रहे हैं। [3]
सखियाँ आपस में वार्तालाप कर रही हैं कि श्यामा कुंजबिहारी का यह सुख और कहीं उपलब्ध नहीं। हे सखी तुम यह सुख दरस दरस कर फूल रही हो, प्रसन्न हो रही हो और ये दोनों भी परस्पर फूल रहे हैं, खेल रहे हैं, कलोल कर रहे हैं। [4]
डोल झूलत दुलहिनि दूलहु। [1]
उड़त अबीर कुमकुमा छिरकत
खेल परस्पर सूलहु ॥ [2]
बाजत ताल रबाब और बहु तरनि तनया कूलहु। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी कौ
अनतब नाहिंने फूलहु ॥ [4]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (48)
सखी सखी से कह रही है - दोनों प्रिया प्रियतम नये-दुल्हा दुलहिन, पुष्पों से शोभित निकुंज प्रांगण में नवीन भावों के श्रृंगार कर झूला झूल रहे हैं। [1]
होली का महोत्सव, चाह रूपी प्यारे का अबीर उड़कर प्यार से लिपट रहा है एवं प्यारी जी के कुमकुम का रंग प्यारे पर छिड़काव कर रहा है। यह होली का खेल अति रसमय है एवं दोनों को हँसने हँसाने में सहायक है। [2]
डोल झूलने के क्रम में अंग अंग स्पर्श से बाजे बज रहे हैं। आभूषणों के आपस में टकराने से मधुर झंकार की ध्वनि उठ रही है। यमुना जी के तट पर दोनों के परम सुंदर तन परस्पर लिपटे हुए सुखी को आनंदित कर रहे हैं। [3]
सखियाँ आपस में वार्तालाप कर रही हैं कि श्यामा कुंजबिहारी का यह सुख और कहीं उपलब्ध नहीं। हे सखी तुम यह सुख दरस दरस कर फूल रही हो, प्रसन्न हो रही हो और ये दोनों भी परस्पर फूल रहे हैं, खेल रहे हैं, कलोल कर रहे हैं। [4]

