जेहि विधि तोहि प्यारी लागौं। [1]
तैसी मोहि कीजिये प्यारी, बार-बार यह मांगौ।। [2]
और नहीं कछु काज काहु सौं, तुम ही सौं अनुरागौं। [3]
भोरी तेरी रीझ लहन कौ, त्रिभुवन तृन सम त्यागौं।। [4]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (422)
हे प्यारी जू, मैं आपसे बार बार यही वर माँगता हूँ कि आप को जिस भाँति भी सुख मिले उसी भाँति ही केवल आप मुझे रखिए । [1 & 2]
श्री राधे जू, मुझे एक मात्र आपसे ही सब प्रकार से आशा है, और किसी से मेरा कोई काम नहीं है, एक मात्र आपसे ही मेरा अनुराग है । [3]
श्री भोरी सखी कहती हैं कि आपको रिझाने के लिए मैंने त्रिभुवन को तृण के समान त्याग दिया है । [4]
तैसी मोहि कीजिये प्यारी, बार-बार यह मांगौ।। [2]
और नहीं कछु काज काहु सौं, तुम ही सौं अनुरागौं। [3]
भोरी तेरी रीझ लहन कौ, त्रिभुवन तृन सम त्यागौं।। [4]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (422)
हे प्यारी जू, मैं आपसे बार बार यही वर माँगता हूँ कि आप को जिस भाँति भी सुख मिले उसी भाँति ही केवल आप मुझे रखिए । [1 & 2]
श्री राधे जू, मुझे एक मात्र आपसे ही सब प्रकार से आशा है, और किसी से मेरा कोई काम नहीं है, एक मात्र आपसे ही मेरा अनुराग है । [3]
श्री भोरी सखी कहती हैं कि आपको रिझाने के लिए मैंने त्रिभुवन को तृण के समान त्याग दिया है । [4]

