किसोरी मोकौं दै श्री वृन्दावन वास। [1]
चाहे सो कीजै श्रीसुन्दरि पूजौ मन की आस ॥ [2]
खग मृग लता रेनु द्रुम बेली निरखों रास बिलास। [3]
दासी जान आन उर स्वामिनि कीजै रूप प्रकाश॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृन्दावन शतक (54)
श्री लाल बलबीर, किशोरी जी से वृन्दावन वास की प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप कुछ भी करके मुझे वृन्दावन वास प्रदान कर दीजिये, और मेरे मन की एकमात्र इच्छा को पूर्ण कर दीजिये। [1 & 2]
किसी भी देह में चाहे पक्षी, मृग, लता, रेनु, वृक्ष एवं बेली कैसे भी करके मुझे वृन्दावन वास प्रदान कीजिये, जिससे मैं नित्य ही आपके संग रहूं और आपके रास विलास को निरखता रहूँ। [3]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि हे स्वामिनी, अपनी दासी मानकर अपने रूप को मेरे हृदय में नित्य प्रकाशित कीजिये। [4]
चाहे सो कीजै श्रीसुन्दरि पूजौ मन की आस ॥ [2]
खग मृग लता रेनु द्रुम बेली निरखों रास बिलास। [3]
दासी जान आन उर स्वामिनि कीजै रूप प्रकाश॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री वृन्दावन शतक (54)
श्री लाल बलबीर, किशोरी जी से वृन्दावन वास की प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप कुछ भी करके मुझे वृन्दावन वास प्रदान कर दीजिये, और मेरे मन की एकमात्र इच्छा को पूर्ण कर दीजिये। [1 & 2]
किसी भी देह में चाहे पक्षी, मृग, लता, रेनु, वृक्ष एवं बेली कैसे भी करके मुझे वृन्दावन वास प्रदान कीजिये, जिससे मैं नित्य ही आपके संग रहूं और आपके रास विलास को निरखता रहूँ। [3]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि हे स्वामिनी, अपनी दासी मानकर अपने रूप को मेरे हृदय में नित्य प्रकाशित कीजिये। [4]

