अब तो जोई मित्र कहावैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), छूटक पद (75)

अब तो जोई मित्र कहावैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), छूटक पद (75)

अब तो जोई मित्र कहावैं । [1]
जो श्रीवृंदावन बसिबे की निश्चय बात दृढ़ावैं ।। [2]
या बिन कहैं सु शत्रु हमारौ सो जिय कबहु न भावैं । [3]
कहें और कैं औसर चुकें सो ‘नागर’ पछितावैं।। [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (75)

अब तो हमारा केवल वही मित्र है जो हमें श्री वृंदावन के वास को दृढ़ करता है। [1 & 2]
अब वह व्यक्ति हमारे शत्रु के समान है जो वृंदावन वास के अतिरिक्त हमको अन्य भाव के लिए कहे, हमको वह अब सपने में भी नहीं भाता । [3]
श्री नागरी दास जी कहते हैं कि संसार में विभिन्न प्रकार की बुद्धि वाले लोग हैं, अगर हम रसिकों (श्री राधा की सखियों) के अतिरिक्त अन्य सभी की बात सुनेंगे या मानेंगे तो, इस अमूल्य अवसर से चूक जाएँगे और फिर बहुत पछताना पड़ेगा । [4]