क्षरन्तीव प्रत्यक्षरमनुपम प्रेम-जलधिं,
सुधाधारा वृष्टीरिव विदधती श्रोत्रपुटयो: ।
रसार्द्रा संमृद्वी परम सुखदा शीतलतरा,
भवित्री किं राधे तव सह मया कापि सुकथा ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (153)
अहा ! जिसके अक्षर-अक्षर से अनुपम प्रेम-जलधि निर्झरित हो रहा है ! जो कर्ण-पुटों में मानों अमृत-धारा-वृष्टि विधान करता है, एवं जो रस से सिक्त, परम कोमल, परम सुखद तथा परम शीतल है। हे श्रीराधे ! मेरे साथ कभी आपका वह रसमय सम्भाषण होगा जो सब प्रकार से अनिर्वचनीय है ?
सुधाधारा वृष्टीरिव विदधती श्रोत्रपुटयो: ।
रसार्द्रा संमृद्वी परम सुखदा शीतलतरा,
भवित्री किं राधे तव सह मया कापि सुकथा ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (153)
अहा ! जिसके अक्षर-अक्षर से अनुपम प्रेम-जलधि निर्झरित हो रहा है ! जो कर्ण-पुटों में मानों अमृत-धारा-वृष्टि विधान करता है, एवं जो रस से सिक्त, परम कोमल, परम सुखद तथा परम शीतल है। हे श्रीराधे ! मेरे साथ कभी आपका वह रसमय सम्भाषण होगा जो सब प्रकार से अनिर्वचनीय है ?

