जेहि पाए बैकुंठ अरु - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (28)

जेहि पाए बैकुंठ अरु - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (28)

जेहि पाए बैकुंठ अरु, हरि हूँ की नहिं चाहि।
सोइ अलौकिक सुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (28)

जिसे प्राप्त करने के बाद वैकुण्ठ और हरि को भी पाने की इच्छा नहीं रहती, वही अलौकिक, शुद्ध, शुभ और सरस वस्तु प्रेम है।